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Puraanic contexts of words like Jahnu, Jagrata / awake, Jaajali, Jaataveda / fire, Jaati / cast etc. are given here.

जलोद्भव वामन ८१ (जलोद्भव द्वारा ब्रह्मा से अवध्यत्व का वर, विष्णु व शिव द्वारा वध ) ।

 

जलौका लक्ष्मीनारायण १.१५५.५४ (अलक्ष्मी की जलौका सदृश अङ्गुलियों का उल्लेख ) ।

 

जल्प मत्स्य ९.१६(तामस मन्वन्तर के सप्तर्षियों में से एक), स्कन्द ५.२.६६ (जल्पेश्वर लिङ्ग का माहात्म्य, जल्प राजा द्वारा पांच पुत्रों के मरण पर जल्पेश्वर लिङ्ग की पूजा, मुक्ति ), ७.१.१०.६(जल्पेश तीर्थ का वर्गीकरण – जल), jalpa  ।

 

जव अग्नि १८.३८(पुरोजव : अनिल वसु - पुत्र),  ब्रह्माण्ड १.२.१३.९५ (स्वायम्भुव मन्वन्तर में शुक्रवर्ग के १२ देवों में से एक), मत्स्य १९५.२०(जवी : भार्गव गोत्रकार ऋषियों में से एक), वा.रामायण ३.३.५ (जव - पुत्र विराध राक्षस के साथ राम के युद्ध का वर्णन ), कथासरित् ११.१.६(रुचिर देव की हस्तिनी तथा पोतक के अश्व द्वय में जव के निर्णय हेतु नरवाहनदत्त का वैशाखपुर गमन, रुचिरदेव की भगिनी जयेन्द्रसेना से विवाह),  ; द्र. मनोजव ।

 

जहु भागवत ९.२२.७(पुष्पवान् - पुत्र, बृहद्रथ वंश ) ।

 

जह्नु नारद १.११६.११ (जह्नु द्वारा जाह्नवी पान व कर्णरन्ध्र से निकालने का उल्लेख), ब्रह्म १.८.१९ /१०.१९ (गङ्गा, कावेरी, जह्नु आख्यान), १.११.८४ / १३.८४ (अजमीढ व केशिनी - पुत्र, गङ्गा का पान, कावेरी का आह्वान), भागवत ९.१५.३(होत्र - पुत्र, पूरु - पिता, गङ्गा पान का उल्लेख), ९.२२.४(कुरु के ४ पुत्रों में से एक), वायु ९१.५४ / २.२९.५४ (जह्नु द्वारा गङ्गा का पान, पुन: जन्म देने के लिए कावेरी को पत्नी बनाना),  ९९.२१७/२.३७.२१२(कुरु के २ पुत्रों में से एक), ९९.२३०/२.३७.२२५(सुरथ - पिता, वंश वर्णन), वा.रामायण १.४३.३८ ( जह्नु द्वारा गङ्गा के पान व श्रोत्रों से पुन: प्रकट करने का कथन), विष्णु ४.७.३ (पुरूरवा के वंशज जह्नु द्वारा गङ्गा को पीने का वर्णन),  ४.१९.७८(कुरु के ३ प्रमुख पुत्रों में से एक जह्नु का उल्लेख), ४.२०.२(सुरथ - पिता, वंश वर्णन), विष्णुधर्मोत्तर १.२० (जह्नु द्वारा गङ्गा का पान, पुन: निस्सारण), हरिवंश १.२७.४ ( सुहोत्र व केशिनी - पुत्र, गङ्गा पान का प्रसंग, कावेरी - पति होने का वर्णन ) । jahnu

 

Comments on Jahnu

जागरण नारद १.१२४.५२ (कोजागर व्रत विधि : लक्ष्मी पूजा), पद्म ६.३७ (एकादशी जागरण का  माहात्म्य), स्कन्द २.५.१३ (द्वादशी जागरण, दानादि की विधि), ५.३.१४३.१० (योजनेश्वर तीर्थ में जागरण से पापमुक्ति का कथन), ६.२७१.६५ (जागर लिङ्ग का माहात्म्य : बालक बक द्वारा लिङ्ग का घृत कुम्भ में क्षेपण, दीर्घजीवियों द्वारा अर्चना),  ७.१.३९ (राजा शशबिन्दु द्वारा शिवरात्रि जागरण की कथा), ७.४.२६.१४ (द्वादशी तिथि में जागरण का माहात्म्य), ७.४.३८.१८ (वैशाख में जागरण व कृष्ण भक्ति का माहात्म्य), १.३४५.७८(सुधना वैश्य द्वारा विभिन्न कालों तक जागरण के महत्त्व का कथन, जागरण फल के दान से ब्रह्मराक्षस की मुक्ति ) । jaagarana

जाग्रत अग्नि ८४.३४ (निवृत्तिकला का जाग्रदवस्था से सम्बन्ध), ८५.१६ (प्रतिष्ठाकला का स्वप्नावस्था से सम्बन्ध), ८६.१०(विद्याकला का सुषुप्ति से सम्बन्ध), स्कन्द ३.१.४९.३३(जाग्रत, स्वप्न आदि से रहित रामेश्वर की पनस द्वारा स्तुति), योगवासिष्ठ ३.११७.१२ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अज्ञान की भूमिकाओं का वर्णन), ४.१९ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय स्वरूप विचार नामक अध्याय : व्याध - मुनि संवाद), ६.२.१०५ ( जाग्रत व स्वप्न के एक्य का प्रतिपादन नामक अध्याय), ६.२.१३७ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय वर्णन नामक सर्ग), ६.२.१४५ (व्याध - मुनि संवाद के अन्तर्गत स्वप्न, सुषुप्ति वर्णन नामक सर्ग), ६.२.१६५ (जाग्रत - स्वप्न एक्य उपदेश नामक सर्ग), ६.२.१६७ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति अभाव प्रतिपादन नामक सर्ग), लक्ष्मीनारायण २.१२.६० (जागृताण्ड द्वारा कन्या हरण करने को उद्यत राजा दमनक को समझाने के प्रयास का कथन ) । jaagrata

जाङ्गल स्कन्द ३.१.४८.५४ (शाकल्य - पुत्र, पिता की मृत्यु पर श्राद्ध, स्वप्न में मुक्त माता - पिता का दर्शन ) ।

 

जाङ्घलामख लक्ष्मीनारायण ३.१०५.१४ (पत्नी के प्रति अधर्म के कारण जाङ्घलामख का मरण व कुन्दधर्मा नामक पत्नी द्वारा विष्णु से सबके जीवन का वरदान पाने का वर्णन ) ।

 

जाजलि गर्ग २.५.४० (जाजलि के शाप से उत्कल के बकासुर रूप धारण करने व मुक्ति का वर्णन),  पद्म ५.१०.३८ (राम के अश्वमेध में पश्चिम द्वार पर जाजलि ऋषि की स्थिति का उल्लेख), ब्रह्मवैवर्त्त १.१६.२० (जाजलि द्वारा वेदाङ्गसार की रचना का उल्लेख), ब्रह्माण्ड १.२.३३.२(ऋग्वेदी ५.५९(अथर्ववेदाचार्य पथ्य के ३ शिष्यों में से एक), २.३.३६.५(पाताल में अनन्त के समक्ष स्थित सिद्धों में से एक), भागवत ४.३१.२ (जाजलि मुनि द्वारा सिद्धि प्राप्ति के स्थान पश्चिम समुद्र तट पर प्रचेताओं द्वारा ज्ञान प्राप्ति), १२.७.२(अथर्ववेदी पथ्य के ३ शिष्यों में से एक), वायु ६१.५२(अथर्ववेदाचार्य पथ्य के ३ शिष्यों में से एक), लक्ष्मीनारायण १.२०२.७ (१६ चिकित्सकों में से एक ) । jaajali

जाजलि जिसने जायमान विचारों आदि को जला दिया है । - फतहसिंह

 

जाटिक लक्ष्मीनारायण २.१०९.८५ (दैत्यों के नाश हेतु ब्रह्मा द्वारा अथर्व मन्त्रों से जाटिकों को उत्पन्न करने का उल्लेख ) ।

 

जाड्यमघ लक्ष्मीनारायण २.७० (जाड्यमघ का राक्षसी काकाक्षी द्वारा हरण, मूर्ख होने से पिता द्वारा ताडन, भय से कूप में गिरने व आमलकी से जीवन - निर्वाह, पूर्व जन्म की लोलुपता के कारण अन्धत्व व जडत्व होने का वर्णन ) ।

 

जातक नारद १.५५ (जातक ज्योतिष का वर्णन ) ।

 

जातकर्म ब्रह्माण्ड २.३.५०.२४(पुत्र जन्म पर जातकर्म क्रिया को उत्सुक पितरों के गृह में आने का उल्लेख), २.३.६३.१३३(और्व द्वारा सगर के जन्म पर जातकर्मादि कर्म करने का उल्लेख), विष्णु ३.१३.२(पुत्र जन्म पर पिता द्वारा सचैल स्नान व नान्दीमुख श्राद्ध आदि करने का निर्देश ) ।

 

जातरूप हरिवंश ३.३४.८ (ब्रह्माण्ड रचना में स्खलित द्रव पदार्थ का जातरूप / सुवर्ण होना), कथासरित् ९.३.५९ (राजा से प्राप्त रत्नयुक्त निम्बू देकर जातरूप / स्वर्ण प्राप्त करने वाले कार्पटिक की कथा ) । jaataroopa

 

जातवेद ब्रह्म २.२८.५ / ९८.५ (भ्राता जातवेदस की मधु दैत्य द्वारा हत्या से अग्नि द्वारा गङ्गा में प्रवेश कर जाने की कथा), ब्रह्माण्ड २.३.१३.४३ (जातवेद शिला पर किए गए दान, श्राद्धादि के अक्षय होने का कथन), भविष्य २.१.१७.१४ (रथाग्नि के जातवेदस नाम का उल्लेख), भागवत ५.२०.१६(कुश द्वीप के वासियों द्वारा जातवेदस् अग्नि के यजन का कथन), ९.१४.४६(पुरूरवा द्वारा अरणि मन्थन से पुत्र रूप जातवेदा अग्नि के प्रकट होने का कथन), मत्स्य ५८.३४(तडागादि की प्रतिष्ठा में यजुर्वेदी ऋत्विजों द्वारा पठित सूक्तों में से एक), वायु ७७.४३/२.१५.४३ (जातवेद शिला : देविका पीठ में जातवेद शिला के महत्त्व का कथन), स्कन्द ५.३.१५५.११५ (जातवेदा से धन की इच्छा करने का निर्देश), हरिवंश २.१२२.३० (कल्माष, कुसुम, दहन, शोषण व तपन की जातवेदा संज्ञा, बाणासुर प्रसंग में जातवेदा अग्नि के वासुदेव के साथ युद्ध का उल्लेख), लक्ष्मीनारायण ३.२५.४ (जातवेद आदि ५ विप्रों द्वारा प्रसविष्णु राक्षस को भिक्षा में लक्ष्मी, रति - काम आदि देने की कथा, भविष्य के ५ इन्द्रों में से एक ) । jaataveda

Contexts on Jaataveda

 

जातहारिणी मार्कण्डेय ७६.२८/ ७३.२८ (जातहारिणी द्वारा अनमित्र - पुत्र को हैमिनी के घर रखने की कथा), स्कन्द ५.२.३३.३० (जातहारिणी द्वारा अनमित्र - पुत्र को हैमिनी के घर, हैमिनी - पुत्र चैत्र को बोध ब्राह्मण के घर ले जाने का प्रसंग ) ।

 

जाति गरुड २.२.६ (अन्त्यज जाति के नामों का उल्लेख), पद्म ३.३८.४६ (शालग्राम क्षेत्र में स्नान से प्रयत्नशील मनुष्य द्वारा जातिस्मर होने का उल्लेख), ३.३८.६७ (कोकामुख में स्नान से ब्रह्मचारियों द्वारा जातिस्मर / पूर्वजन्म - स्मृति होने का उल्लेख), ६.२०१.१७ (इन्द्रप्रस्थ तीर्थ में स्नान से शिवशर्मा को जाति ज्ञान होने का कथन ; पूर्व जन्म का वर्णन), ब्रह्मवैवर्त्त १.९.११(जातिस्मर : चन्द्रमा व स्मृति - पुत्र), १.१० (जाति आविर्भाव का वर्णन), भविष्य १.४०.८ (संस्कारित, शिक्षित ब्राह्मण जाति का कथन), २.१.५.८७ (४ विप्र जातियों में सूर्य विप्र की श्रेष्ठता का उल्लेख), ४.१३ (जातिस्मरत्व प्राप्ति के लिए ४ भद्र व्रतों का वर्णन ; नारद द्वारा सञ्जय को जातिस्मर, स्वर्णष्ठीवी पुत्र प्राप्ति के वरदान की कथा), मत्स्य १२३.३ (जात्यञ्जन : गोमेदक द्वीप में सुमना पर्वत का विशेषण), विष्णु ३.७.९(जातिस्मर कालिङ्गक ब्राह्मण द्वारा भीष्म को यम - अनुचर संवाद सुनाना), विष्णुधर्मोत्तर १.८७.११ (ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि जात्याश्रित नक्षत्रों का कथन), ३.२००.४ (इष्ट जाति व्रत : यथेष्ट जाति प्राप्ति हेतु हरि पूजा का कथन), शिव ७.२.५.१६ (शिव के जाति - व्यक्ति स्वरूप होने का विवेचन ; जाति व व्यक्ति तथा जाति व पिण्ड में सम्बन्ध का कथन), ७.२.१६.४४ (समयाचार दीक्षा के अन्तर्गत जाति से क्षत्रिय को ब्राह्मण की भांति बनाने एवं रुद्रत्व स्थापना का वर्णन), ७.२.१८.११(देवों की ८, तिरश्चीनों की ५ तथा मनुष्यों की १ जाति का उल्लेख), स्कन्द २.१.१६.१९(विप्र के पादोदक से सिञ्चन पर गृहगोधा द्वारा जातिस्मरत्व की प्राप्ति), ५.१.५८.२८(७ पितरों का श्राद्ध करने से भरद्वाज - पुत्रों के जातिस्मर होने का कथन), ५.२.६९.३९ (सुबाहु राजा द्वारा सङ्गमेश्वर लिङ्ग दर्शन से जातिस्मर होकर शिरोवेदना के कारण का वर्णन करना), ५.२.७८.१६ (चित्रसेन कन्या लावण्यवती द्वारा पूर्वजन्म में पिप्पलादेश्वर के दर्शन से जातिस्मरा होने का वर्णन), ५.३.५५.३९ (तीर्थ माहात्म्य के लेखन से जातिस्मर होने का उल्लेख), ५.३.१५९.१७ (मात्सर्य के फलस्वरूप जातिअन्ध होने का उल्लेख), ५.३.१९६.४ (हंस तीर्थ में स्नान व दान का संक्षिप्त माहात्म्य : जातिस्मर होना), महाभारत शान्ति २९६.३१(पराशर गीता के अन्तर्गत जाति या कर्म से दूषित होने का प्रश्न), लक्ष्मीनारायण २.२४६.३० (ज्ञाति के वैश्वदेव लोकेश्वरी होने और ज्ञाति से भेद न करने का निर्देश), ३.९१.८४ (कृशाङ्ग चाण्डाल द्वारा जाति परिवर्तन हेतु तपस्या करने का वर्णन ) ; द्र. प्रजाति jaati

 

जातिपुष्प अग्नि १९१.५(जातीफलाशी द्वारा वैशाख में महारूप के यजन का निर्देश), वामन ६.१०१ (कामदेव के धनुष का ऊपरी भाग जातिपुष्प बनने का कथन), स्कन्द २.२.४४.४ (जाति पुष्प से हरि अर्चना का उल्लेख), २.५.७.२७ (विष्णुपूजा में जाति पुष्प की श्रेष्ठता का कथन),  ७.१.२४.४७ (जाति पुष्प की अन्य पुष्पों से तुलना), ७.१.२४.४९ (जाति - मुक्त पुष्प का शिव पूजा में निषेध), हरिवंश २.८०.२६ (जाति / चमेली के पुष्प जैसे सुन्दर दांतों का उल्लेख), २.८०.३४ (सौन्दर्य प्राप्ति हेतु किए गए दान में जातिपुष्प लता के दान का उल्लेख ) ।

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